Tuesday, 7 July 2015

दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट : 5 लाख की जगह 312 रुपये दिलाने वाला अंधा कानून

दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट : 5 लाख की जगह 312 रुपये दिलाने वाला अंधा कानून

दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट दिल्ली के लाखों लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है जिनमें सिर्फ मकान मालिक ही नहीं बल्कि किरायेदार भी शामिल हैं.
सितंबर 2014. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका के मेडिसन स्कवेयर गार्डन से लोगों को संबोधित कर रहे थे. इस संबोधन में उन्होंने कहा, ‘पहले भारत में जो सरकारें थी, वे बड़े गर्व से यह बताती थी कि हमने कितने कानून बना डाले हैं. लेकिन मैं दूसरी तरह की बात कहता हूं. मैं नए कानून बनाने की नहीं बल्कि पुराने कानूनों को ख़त्म करने की बात करता हूं. यदि मैं रोज़ एक कानून भी समाप्त कर पाया तो खुद को दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति मानूंगा.’ प्रधानमन्त्री मोदी की यह बात सुनकर प्रवीण जैन के चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. 70 वर्षीय प्रवीण पुरानी दिल्ली में रहते हैं. उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हो चुकी है और अब वे अकेले ही रहते हैं. करोल बाग़ में उनकी एक संपत्ति है जिसमें लगभग 40 किराएदार हैं. लेकिन हर किराएदार महीने का 10 या 12 रूपये ही किराया चुकाता है. इस तरह से अपने 40 किराएदारों से कुल मिलाकर प्रवीण को सिर्फ 450 रूपये हर महीने मिलते हैं. प्रवीण बताते हैं कि यह वसूलते हुए भी उनसे ऐसा बर्ताव किया जाता है जैसे वे भीख मांग रहे हों.
1958 का दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट अपने शुरुआती दौर में किराएदारों का शोषण रोकने में तो सफल हुआ लेकिन धीरे-धीरे मकान मालिकों के शोषण का सबसे बड़ा कारण भी बन गया.
प्रवीण जैन की इस दुर्गति का मूल कारण 1958 में लागू हुआ दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट है. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी ने जब पुराने कानूनों को समाप्त करने की बात कही तो प्रवीण को अच्छा लगा. अपने कहे अनुसार मोदी सरकार ने कई पुराने कानूनों को समाप्त करने का काम शुरू भी कर दिया है. लेकिन दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट आज भी बरकरार है और दिल्ली के लाखों लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है.
दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 के दुरूपयोग का सबसे अच्छा उदाहरण ‘एंबेसी’ रेस्टोरेंट है. दिल्ली के कनॉट प्लेस में जिस जगह यह रेस्टोरेंट है, वह दुनिया की सबसे मंहगी व्यवसायिक जगहों में से एक है. इसके बावजूद भी 2500 वर्ग फुट पर बने इस रेस्टोरेंट के महीने का किराया मात्र 312 रूपये है. जबकि कनॉट प्लेस के इसी इलाके में जानी-मानी फास्ट फूड चेन केएफसी 5,000 वर्ग फुट जगह का दस लाख रुपये प्रतिमाह से ज्यादा किराया चुका रही है.
अधिकतर राज्यों में रेंट कंट्रोल एक्ट समाप्त किए जा चुके हैं या उनमें संशोधन किया जा चुका है. दिल्ली में भी यह कानून आंशिक तौर पर बदला गया लेकिन इसका फायदा मकान मालिकों को नहीं मिला. नतीजतन 1958 का दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट अपने शुरुआती दौर में किराएदारों का शोषण रोकने में तो सफल हुआ लेकिन धीरे-धीरे मकान मालिकों के शोषण का सबसे बड़ा कारण भी बन गया. इसकी सबसे बड़ी कमी यह रही कि इसमें वक्त के साथ संशोधन नहीं हुए. मुख्य संशोधन इसके लागू होने के लगभग 30 साल बाद हुआ. 1988 में इस कानून में दो मुख्य बदलाव किए गए. एक, 3500 रुपये प्रतिमाह से ज्यादा किराया चुकाने वाले किराएदारों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया और दूसरा हर तीन साल में 10 प्रतिशत तक किराया बढ़ाए जाने की व्यवस्था की गई.
नए कानून को अगस्त, 1995 में राष्ट्रपति की सहमति भी मिल चुकी थी . लेकिन दिल्ली के पुराने किराएदारों और व्यापारियों ने इसका जबरदस्त विरोध किया जिसके चलते केंद्र सरकार नए कानून को आज तक लागू नहीं कर सकी.
लेकिन इन बदलावों से भी मकान मालिकों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. किराया बढ़ाने पर शुरू से ही रोक के कारण पुराने किराएदारों में से ज्यादातर 1988 में भी 3500 से कम किराया ही चुका रहे थे. इसलिए वे सभी किराएदार इस संशोधन के बाद भी संरक्षित ही रहे. 1995 में भारत सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया. संसद ने 1995 में ‘दिल्ली किराया अधिनियम’ पास कर दिया. इस अधिनियम में मकान मालिकों के हितों को देखते हुए बाजार भाव पर किराया तय करने और जरूरत पड़ने पर किराएदार को बेदखल करने के भी प्रावधान थे. इस नए कानून को अगस्त, 1995 में राष्ट्रपति की सहमति भी मिल चुकी थी और बस केंद्र सरकार को एक तिथि तय करते हुए इसे लागू करना था. लेकिन दिल्ली के पुराने किराएदारों और व्यापारियों ने इसका जबरदस्त विरोध किया. इस विरोध के चलते केंद्र सरकार नए कानून को राष्ट्रपति की सहमति के बावजूद भी आज तक लागू नहीं कर सकी.
हाउस ओनर्स एसोसिएशन, करोल बाघ के सचिव वेद प्रकाश शर्मा बताते हैं, ‘हमने प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृह मंत्री और सचिव (शहरी विकास) के नाम एक ज्ञापन तैयार किया है. हमारी तीन मुख्य मांगे हैं. पहली, मॉडल टेनेंसी एक्ट, 2015 के आधार पर एक नया अधिनियम बनाकर आने वाले सत्र में ही पास किया जाए और दिल्ली में लागू किया जाए. दूसरी, इसकी जांच हो कि 1995 का एक्ट राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद भी लागू क्यों नहीं किया गया. इसके लिए जो भी दोषी हैं उन्हें सजा हो. और तीसरी, हमें 1995 से अब तक का बकाया किराया दिया जाए.’ वेद शर्मा आगे बताते हैं, ‘1995 में जब नया कानून बन गया था तो हम कानूनन बढे हुए किराए के हकदार हो गए थे. लेकिन उसे लागू नहीं किया गया और 20 साल तक दबाकर रखा गया. इससे सीधा नुकसान हमें ही हुआ है. इसकी भरपाई हमें की जाए.’
जितनी तकलीफ दिल्ली के हजारों मकान मालिक अपने पुराने किराएदारों के कारण झेल रहे हैं, लगभग उतनी ही तकलीफ दिल्ली के नए किराएदारों में से कइयों को अपने मकान मालिक के कारण झेलनी पद रही है.
रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 को समाप्त करने के लिए कुछ लोग सरकार से मांग कर रहे हैं तो कुछ लोग इसको असंवैधानिक घोषित करवाने के लिए न्यायालय की शरण में भी पहुंचे हैं. दिल्ली निवासी शोभा अग्रवाल ने इस संबंध में एक याचिका भी दाखिल की है. 20 अगस्त 2015 को इस याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में अंतिम बहस होनी है. ‘यह कानून संविधान के अनुछेद 14, अनुछेद 19(1) (जी) और अनुछेद 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन करता है. कानून सबके लिए एक समान होने चाहिए’ शोभा अग्रवाल बताती हैं, ‘इस कानून के अंतर्गत वे ही लोग आते हैं जिनका किराया 3500 रुपये से कम है. यह पैमाना आज खरा नहीं है. इससे यह भी सुनिश्चित नहीं होता कि किराएदार गरीब व्यक्ति है. कई करोड़पति भी इस पैमाने के कारण किराया नियंत्रण का दुरूपयोग कर रहे हैं.’
दिल्ली में नया रेंट कंट्रोल एक्ट लागू करने की मांग सिर्फ इन मकान मालिकों की ही नहीं बल्कि लाखों किराएदारों की भी है. जितनी तकलीफ दिल्ली के हजारों मकान मालिक अपने पुराने किराएदारों के कारण झेल रहे हैं, लगभग उतनी ही तकलीफ दिल्ली के नए किराएदारों में से कइयों को अपने मकान मालिक के कारण झेलनी पद रही है. प्रभावी कानून न होने के कारण एक तरफ करोड़ों की कमाई करने वाला ‘एंबेसी’ रेस्टोरेंट महीने का मात्र 312 रूपये किराया चुका रहा है, वहीँ दूसरी तरफ दिल्ली में पढने आए छात्रों को छोटे से छोटे कमरा का भी सात से आठ हजार रूपये तक किराया देना पड़ता है. दिल्ली विश्वविद्यालय के कई छात्र इस मुद्दे पर लम्बे समय से आन्दोलन भी कर रहे हैं. इस आन्दोलन से शुरुआत से ही जुड़े रहे प्रवीण सिंह बताते हैं, ‘दिल्ली में लाखों छात्र हर साल पढने आते हैं. यहां छात्रावास बेहद सीमित हैं इस कारण अधिकतर छात्रों को किराए पर ही रहना पड़ता है. लेकिन दिल्ली में किराए के नियंत्रण की कोई व्यवस्था ही नहीं है. 1958 का कानून इन मकान मालिकों पर लागू नहीं होता. इस कारण ये लोग मुह-मांगा दाम वसूलते हैं और हर साल उसे बढ़ा भी देते हैं.’
प्रवीण सिंह और उनके साथियों ने दिल्ली सरकार से मांग की है कि यहां किराए के नियंत्रण की कोई प्रभावी व्यवस्था लागू की जाए. प्रवीण बताते हैं, ‘हमने इस संबंध में दिल्ली सरकार को लिखित ज्ञापन सौंपे हैं. हमें यह आश्वासन भी मिला है कि सरकार इस मुद्दे पर विचार रही है. इसके लिए सरकार के पास 2 अक्टूबर तक का समय है. यदि तब तक भी कोई व्यवस्था नहीं की गई तो हम अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे.’

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